गुस्सा : पैसा पहले कश्मीर फिर जम्मू को, बचा-खुचा लद्दाख को

जम्मू. जम्मू-कश्मीर देश का इकलौता ऐसा सूबा है, जहां दो किस्म की सियासत सांस लेती है। एक जम्मू की और एक घाटी, यानी कश्मीर की। श्रीनगर के गुपकार रोड (जहां सभी सियासी आकाओं का ठिकाना है) की नब्ज दिल्ली से मुकर्रर होती है और डोगराओं के जम्मू की पॉलिटिक्स कश्मीरियत से गुलजार घाटी से।

एक ही राज्य के ये दो इलाके हैं, जो अपनी राजधानी छह-छह महीने साझा करते हैं। लेकिन जो बात राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा आक्रामक बनाती है वह है दोनों इलाकों के बीच मुकाबला, बंटवारा और भेदभाव। पॉलिटिकल एनालिस्ट रेखा चौधरी कहती हैं जम्मू में राजनीतिक मसलों में कश्मीर जरूर होता है। यही वजह है कि मोदी ने जम्मू में अपनी रैली में ज्यादातर बयान कश्मीर पर दिए।

इन चुनावों में मुफ्ती की पीडीपी यानी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और अब्दुल्ला की एनसी यानी नेशनल काॅन्फ्रेंस ने जम्मू में प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है। इससे भाजपा के लिए खेल मुश्किल हो गया है। जाति और धर्म के आधार पर बंटने वाला वोट किसे मिलेगा यह वक्त तय करेगा। भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी करने में तो बागी नेता लाल सिंह भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने जम्मू क्षेत्र की दोनों सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। लाल सिंह ने डोगरा प्राइड को मसला बनाया है। भाजपा के लिए दूसरी चुनौती उसके सांसदों से बेरुखी है। चुनावों से इतर उनके नेता कभी खैर-खबर पूछने नहीं आए। हालत यह हैं कि केंद्रीय मंत्री और सांसद जितेंद्र सिंह घर-घर जाकर वोट बटोरने की कवायद में हैं।

हालांकि, जीते कोई भी टक्कर कांटे की तय है। कांग्रेस ने जम्मू-पुंछ सीट से रमन भल्ला को खड़ा किया है, जो आम लोगों से कनेक्ट के लिए मशहूर हैं। डोडा-उधमपुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी रॉयल फैमिली के विक्रमादित्य सिंह हैं, जो कर्ण सिंह के बेटे हैं। विक्रमादित्य पीडीपी छोड़कर कांग्रेस में आए हैं। दोनों ही सीटों पर एनसी और पीडीपी प्रत्याशी न होने से गैर हिंदू वोट कांग्रेस को मिलेगा। बागी निर्दलीय प्रत्याशी जैसे भाजपा के लाल सिंह, पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव और रिफ्यूजियों के रिप्रेजेंटेटिव राजीव चूनी भाजपा कांग्रेस के वोट काटने के काम आएंगे। कांग्रेस के बड़े नेता श्याम लाल भाजपा में आ गए हैं।

आरएस पुरा के सतिंदर शर्मा के मुताबिक हमारा भरोसा मोदी पर ही है। रिफ्यूजियों के नेता राजीव चूनी की राय इससे उलट है। चूनी कहते हैं ‘भाजपा और कांग्रेस ने हमें बारी-बारी ठगा है। दोनों के लिए अहम सिर्फ कश्मीरी हैं, लद्दाखी और डोगरे नहीं। जम्मू इलाके में पिछले चुनाव में वोट मोदी लहर में पड़े थे। किसी धर्म या जाति में बंटे बगैर। ये वह पैटर्न है जो जम्मू के लिए नया नहीं है। बतौर सीएम उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को भी कभी विधानसभा चुनाव में ऐसे ही वोट मिले थे। लेकिन वही आजाद पिछले लोकसभा चुनाव में 60 हजार के मार्जिन से हारे थे। तब जम्मू में पैंथर्स पार्टी और कांग्रेस को मिलने वाला एससी वोट मोदी को मिला था। यही वोट इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती साबित हो सकता है। पिछली बार एनसी कांग्रेस के साथ लड़ी थी।

क्षेत्र के लिहाज से सबसे बड़ी सीट लद्दाख

एरिया के हिसाब से देश का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र है लद्दाख। यह 1.7 लाख वर्ग किलो मीटर में है और वोटर हैं 1.59 लाख। बौद्ध अनुयायी ज्यादा  हैं और  पिछली बार बौद्ध धर्म गुरु  थुमस्तान चेवान्ग भाजपा से जीते थे।

पिछले साल नवंबर में पूरी तरह आध्यात्म मार्ग अपनाने के लिए चेवान्ग ने इस्तीफा दे दिया था। बौद्ध धर्म तो भाजपा के इस बार के प्रत्याशी 31 साल के जमयान्ग सेरिंग नमग्याल भी फॉलो करते हैं। वह पुराने सांसद चेवान्ग के पर्सनल सेक्रटरी रह चुके हैं।

नमग्याल हिल डेवलपमेंट काउंसिल के सीईसी हैं। पढ़ाई के दौरान वह स्टूडेंट लीडर रह चुके हैं। लद्दाख में उपद्रव या आक्रामकता जैसी चीजें देखने को नहीं मिलती, लेकिन इस साल कारगिल, स्कर्दू रोड़ खोलने और बाकी इलाके के मसलों पर छिटपुट प्रदर्शन देखने को मिले हैं।

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